शनिवार, 14 जनवरी 2012

जान की तरह ...

जिस्म में रहते थे कभी जान की तरह,
अब अपनें घर में हैं मेहमान की तरह !!

इंतज़ार नें महरूम रक्खा, शाम होते ही,
वो दिल अपना बढ़ा गए दुकान की तरह !!

मेरी हर बात उसनें रक्खी संभालकर,
कचहरी में दिए हुए बयान की तरह !!

बालू के ढेर में, एक सीपी मिली मुझे,
किसी बुझे-हुए दिल में अरमान की तरह !!

एक-एक पल में, सौ-सौ बार जताया,
प्यार भी किया किये एहसान की तरह !!

हमीं नें रक्खे जिनके तरकश में तीर,
वो हमीं पे तन गए कमान की तरह !!

अक्सर महफिलों में पेश करते हैं,
हमें खोलकर वो पानदान की तरह !!

हैवान
भी फरिश्तों-सी बात करनें लगा,
हम जो पेश आये एक इंसान की तरह !!

मक्खनपलोस पा गए किताबों में नाम,
हुनरमंद लापता रहे भगवान की तरह !!

भरी-पूरी दुनिया में, होते हुए 'निशात',
कुछ लोग रहे ताउम्र, श्मशान की तरह !!

1 टिप्पणी:

  1. हैवान भी फरिश्तों-सी बात करनें लगा,
    हम जो पेश आये एक इंसान की तरह !!

    वाह गज़ल का यह शेर काबले दाद है यों तो सारे शेर अच्छे है !

    उत्तर देंहटाएं